सोमवार, 30 मार्च 2009

"दर्द के वर्क पर" गुरूसहाय भटनागर ‘‘बदनाम’’

दर्द के वर्क पर गीत हमने लिखे

रोज़ ही हम उन्हें गुनगुनाते रहे

गाहे आबादियाँ गाहे बीरानियाँ

उनसे मिलने की यादें सजाते रहे

नाम लिख-लिख के उनका हर रोज ही

अपने दिल में उन्हें हम बसाते रहे

उनकी खुश्यिों की खातिर कहाँ से कहाँ

मंजिलों में भी महफिल सजाते रहे

चल दिये छोड़ कर साथ कुछ इस तरह

जिन्दगी भर हमें याद आते रहे

बन के ‘बदनाम’ ओढ़ी है रुसवाइयाँ
वो हमें हम उन्हें याद आते रहे।

रविवार, 1 मार्च 2009

तुम पे मिटना आ गया (गुरु सहाय भटनागर बदनाम)

गुलों को खिल खिलाना आ गया
हमें भी दिल लगाना आ गया है

बशर कोई न ये सब जान पाये
उन्हें छुपना छुपाना आ गया है

लगन चाहत की मन को भा गयी है
ग़जल अब गुन-गुनाना आ गया है

जो डर जाये मोहब्बत क्या करेगा
बहारो तुम पे मिटना आ गया है

चलो दिल देके तुम अब भूल बैठे
हमें ‘बदनाम’ बनना आ गया है।

रविवार, 22 फ़रवरी 2009

मोहब्बत हो गयी (गुरू सहाय भटनागर ‘बदनाम’)

हमको जब तुमसे मोहब्बत हो गयी
जिन्दगी अपनी बहुत ही खूबसूरत हो गयी
उनसे मिलना, बातें करने में मजा आने लगा
हर घड़ी फिर देखने की तुमको चाहत हो गयी
जब तेरा रूखसार पर जुल्फें गिराना बार-बार
अब घटा बरसात की बरसेगी राह हो गयी
सुर्ख लव पर मुस्काराह, आंख में मयका नशा
बिन पिये ही आज अपनी कैसी हालत हो गयी
ये हंसी शाम कभी फिर नहीं आने वाली
तुम जो आओगें तो समझेगें महोब्बत हो गयी
तेरी इन शोख अदाओं पे ‘बदनाम’ दिल लुटा बैठे
बिन तेरे अब जिन्दगी जीना मुश्बित हो गयी।